श्री १००८ संकटहर पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, जैनगिरी, जटवाडा

महाराष्ट्र प्रान्त में औरंगाबाद शहर के उत्तरी में हर्सूल जेल से ९ की. मी. की दूरीपर सह्याद्री के पहाड़ी के पास बसे हुए जटवाडा क्षेत्र का इतिहास बड़ा ही मनोरम्य हैं | आजसे करीब २४ वर्ष पूर्व २८ अगस्त १९८७ को जो यह क्षेत्र सबके सामने आया वह सैंकड़ो वर्षो से विद्यमान था |
आज से करीब ६०० वर्ष पूर्व जब दिल्ली से मुस्लिम बादशाह महम्मद तुग़लक दौलताबाद आया था, तब उसके साथ जैन अग्रवाल व्यापारी भाई अपने परिवार साथ व्यापार करने हेतु आये थे | यह व्यापारी भाई दौलताबाद परिसर के आजू बाजू में व्यापार करने लगे | उसी समय यह समाज जटवाडा क्षेत्र में बस गया | यहाँ जैनियों की बस्ती ज्यादा संख्या में रहने के कारण अनेको मंदिर स्थित थे | इन मंदिरों में सेंकडो की संख्या में मूर्तियाँ थी | पुरातत्व विभाग के इतिहास में देखा जाए तो इस गाँव का नाम जैनवाडा था, जो आगे जाकर अपभ्रंश होकर जटवाडा हो गया |
कुछ कारणवश बादशाह महम्मद तुग़लक दौलताबाद से फिर दिल्ली चला गया | इसी कारण यहाँ के अग्रवाल दिगंबर जैन भाई को व्यापार करने हेतु गाँव छोड़कर नजदीक पास के गाँव में जाना पड़ा | मंदिर में के प्रतिष्ठित वीतराग भगवान के प्रतिमाओं का अविनय न हो इसलिए उन्हें सुरक्षित स्थान पर विराजित ( तलघर ) किया गया |
आज से ४५ वर्ष पूर्व औरंगाबाद निवासी श्री पुन्जालालसा साहूजी की धर्मपत्नी सौ. सोनाबाई को एक दिन स्वप्न हुआ | स्वप्न में दिखा एक प्राचीन भव्य जिन मंदिर जिनमे अनेक मूर्तियाँ सुशोभित हो रही थी | स्वप्न की बात पति से कही | बात की सच्चाई जानने के लिए औरंगाबाद शहर के आस पास के गाँव में खोजबीन की गयी | जैसा सपने में देखा, वैसा ही मंदिर एवं द्वार पाया जटवाडा में | मंदिर के द्वार पर ही एक वीतराग जिन प्रतिमा उत्कीर्ण थी, इससे स्पष्ट हुआ की यही वह मंदिर हैं | आचार्य तीर्थरक्षा शिरोमणि श्री आर्यनंदीजी महाराज इस समय आसपास विहार कर रहे थे | उन्हें उपरोक्त घटना का पता चला और जटवाडा पहुँच गए | जब मंदिर के अन्दर देखा तो वेदी के निचे भुयार दिखा, जिसमें भ. पद्मप्रभुजी की सुन्दर प्रतिमा (पाषाणकी) मिली | उस समय एलोरा गुरुकुल के अध्यापक ब्र. रामचन्द्रजी बाकलीवाल थे | (जो आगे मुनि श्री जयभद्रजी महाराज के नाम से जानने लगे ) यह समय अप्रैल १९६८ का था |
आगे आचार्य श्री १०८ महावीरकिर्तिजी महाराज अपने विहार दौरान जटवाडा पहुंचे | तब उन्होंने उसी समाय कहा था, यहाँ जमीनध्वस्त मंदिर एवं मूर्तियाँ हैं जो निकलनेपर यह क्षेत्र भारतीय तीर्थक्षेत्र के प्रसिधी पर आकर रहेगा | इस बात की पुष्टि मूर्तियाँ प्राप्त होने के पश्चात आचार्य श्री आर्यनंदीजी महाराज ने भी की थी |
अप्रैल १९६८ पश्चात इस मंदिर की व्यवस्था याने भ. पद्मप्रभुजी की नित्य नियम से अभिषेक पूजा सौ. सोनाबाई पूंजासा साहूजी ने संभाली | सोनाबाई के सपनेमे बारबार भुयार मंदिर एवं मुर्तिया प्रगट होती थी | लेकिन स्थान नहीं मिल रहा था | लेकिन एक भव्य तपस्वी दिगंबर साधू की वाणी असत्य कैसे होती?
ता. २८ अगस्त १९८७ को शेख नूर जटवाडा नामक एक मुस्लिम व्यक्ति अपने घर की नीव के लिए पत्थर निकाल रहा था | पत्थर जैसे निकालने लगा, तो वह पत्थर जमीन में धसता चला गया | लोगों को आश्चर्य हुआ | उन्होंने अन्दर झाककर देखा तो एक भुयार था | लोग भुयार में गए तो सभी आश्चर्य से तथा ख़ुशी से उछल गए, क्योंकि अन्दर विशाल २१ प्रतिमाएं विराजमान थी | सौ सोनाबाई के खुशियों का ठिकाना नहीं रहा | अपना सपना जो सच हो गया | यह पुनीत दिन था, भाद्रपद शुक्ल पंचमी, पर्युषण पर्व का प्रथम दिन | यह सूचना औरंगाबाद के जैन भाइयों को दी गयी | जटवाडा में जैन भाइयों की यात्रा उमड़ पड़ी | एक ट्रस्ट कायम किया गया | उस समय के स्थानिक विधायक अम्मानुल्ला मोतीवाला के प्रयास से यह प्रतिमाएं ट्रस्ट को शासन द्वारा प्राप्त हुई एवं जिन मंदिर के वेदी पर रख कर पूजा अभिषेक की विधि शुरू हो गयी | सभी मूर्तियाँ प्रतिष्ठापित की हुई एवं उसपर शिलालेख लिखा हुआ था | सभी प्रतिमाएं १५, १६ एवं १७ वे शताब्दी की हैं | आगे सभी मुर्तिया चमत्कृत सिद्ध हुई | एक नागराज यहाँ हमेशा अष्टमी , चतुर्दशी, पौर्णिमा एवं इतवार आदि शुभदिन आकर दर्शन कर अदृश्य हो जाता हैं | यही मंदिर आगे श्री १००८ संकटहर पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, जैनगिरी जटवाडा के नामसे प्रसिद्ध हुआ |
फरवरी १९९४ में ज्ञानयोगी प्रज्ञाश्रमण आचार्य श्री देवनंदीजी महाराज क्षेत्र पर दर्शनार्थ आये तब ११ दिन तक उनका यहाँ वास्तव्य रहा | उन्होंने क्षेत्रोद्धार की प्रेरणा दी तथा वेदिशुद्धि का समारोह सम्पन्न हुआ | आचार्य श्री देवनंदीजी महाराज की पवन प्रेरणा एवं मंगल आशीर्वाद से ट्रस्ट एवं सभी समाजने क्षेत्रोद्धार करने का निश्चय किया | देखते देखते क्षेत्र पर मंदिर जीर्णोद्धार का कार्य, कार्यालय, महाद्वार, मुनिनिवास, भोजनशाला, अतिथिनिवास में ३३ कमरोंकी सुविधा, २ बड़े हॉल, बारा हजार स्व्के. फूट का आचार्य देवनंदी हॉल, तीन मूर्ति एवं चोबिसी की स्थापना, मंदिर का अद्वितीय शिखर, अप्रतिम मानस्तंभ, धर्मशाला महाद्वार एवं पहाड़ीपर भ. बाहुबली की प्रतिमा की स्थापना आदि कार्य सम्पन्न हुए | क्षेत्र पर आज तक सेंकडो दिगंबर जैन आचार्य, मुनि आर्यिकाओंका आवागमन रहा | क्षेत्र पर प्रति वर्ष भगवान पार्श्वनाथजी के जन्म कल्याणक दिन पर वार्षिक यात्रा का आयोजन होता हैं | मूलनायक श्री १००८ संकटहर पार्श्वनाथ भगवान के प्रतिमा का क्षेत्र पर हर पोर्णिमा, अमावस्या एवं इतवार को सुबह १०.०० बजे एवं शेष दिनोमे सुबह ९.०० बजे पंचामृत अभिषेक होता हैं|
जटवाडाके समीप वर्ती क्षेत्र
एलोरा - २३ की. मी.
कचनेर - ५० की. मी.
पैठन - ६४ की. मी.
अजंता - १०५ की. मी.
जिन्तुर नेमगिरी- १७५ की. मी.
नवागड़ - २३५ की. मी.
कुन्थलगिरि - २०५ की. मी.
गजपंथा नाशिक - २०० की. मी.
मांगीतुंगीजी - १९० की. मी.

क्षेत्र के दूरध्वनी - ०२४० - २६०१००८, २१००९१४